Monday, August 5, 2013

देवताओं से साक्षात्कार

देवताओं से साक्षात्कार

आओ कि देवताओं से साक्षात्कार करते हैं, पूछते हैं उनसे 
कि किस तरह रहते हैं इतनी उॅंचाई पर हमसे दूर रहकर 
हमारी आपदाओें पर हंसते हुए 
आओ देखें कि किस तरह उनका कटता है 
दूसरों की विपत्तियों पर हंसते हुए उनका दिन 
कैसे गुजरती हैं उनकी रातें ।

हमारी अन्धकार भरी दुनिया से दूर , पर सूरज के इतने समीप रहते हुए
कैसे-कैसे सपने देखते हैं ये देवता 
कि आओ
नजदीक से देखते हैं इन्हैं
देखते हैं कैसे स्कूलों में पढ़ा-लिखा इन्होंने और
कैसे स्कूल हैं इनके जहाँ पढ़ रहे हैं इनके बच्चे
और यह भी कि देवता क्या सिखा रहे हैं अपने मासूम बच्चों को
और देखें कैसे गोरे, काले विचारों और रूपों के बन रहे हैं उनके बच्चे
अपने अलावा और दीन-दुनिया की कैसी समझ है उनकी
अपने से बाकी लोगों और उनके बच्चों के बारे में ।

और यह भी कि क्या उनको
अपने अस्तित्व की गलतफहमी अभी भी है
या उनको या उनको पता चल चुका है कि
उनका अस्तित्व अब संकट में है और
कोई वकील या न्यायालय कह सकता है उनके बारे में
कि वे कभी किसी घर में पैदा हुए थे या बेघर ही रहे सदा
या कि उनको अपना अस्तित्व बचाने के लिए जाना होगा न्यायालय के पास
और अपने तथा अपने पिता की वल्दियत के सबूत ठीक-ठीक लेकर ।

आओ देखो, किस तरह गढ़ी
जाती हैं स्वर्ग के तोरण द्वार की उॅंचाई
जहाँ आमोखास अपनी औकात के अनुसार ही पाते हैं प्रवेश
बाकी को उनका कोई सिपाही ही बता देता है बाहर का रास्ता।

आओ पता करें देवताओं से कि
उन्होंने बनाया कि नहीं अपना कोई नया संविधान
या वे पुराने संविधान से ही चला रहे हैं काम
और दीन दुनिया को समझ और हाँक रहे हैं पुराने कानूनों से ।
और इस तरह, किसी तरह ही चला रहे हैं अपना काम
आओ पता करें देवताओं से उन्होंने बंद किया कि नहीं
अपने अधीनस्थ देवताओं का शोषण बंद
या या उन की पहचानों पर आयद हो रहीं है
अभी भी उनकी बेतरतीब सी कार्यविभाजन नीति ।

आओ आग और पानी के देवता से इन, उन से, सबसे
सबसे पता करते हैं कि उनको पता है कि नहीं अपनी असलियत
कि उनके अस़्त्र-शस्त्र अब हो चुके पुराने
और उनके नए रिसर्च में भी कोई चमत्कार नहीं रहा ।

आओ देखें देवताओं के पुराने गुप्तचर भी
पुरानी चर परंपरा से ही चल रहे हैं या कि
पीछे हैं बहुत हमारे आबाओं-बाबाओं से
वक्ताओं से भक्तों से
जो दोहन कर रहे हैं उसी देवता के लोक का ।
तो आओ चलना ही होगा देवताओं के लोक में
यह जानने के लिए कि देवता कैसे कैसे चला रहे हैं
उतनी बिगड़ी व्यवस्था से अपना काम ।

आओ बताए उन्हें कि मनुष्य अब बढ़ गया है काफी आगे
और यहीं इसी दुनिया से पता कर ले रहा है उनके लोक की हलचल और खलबली
और देवता तुम्हारे औजारों, आविष्कारों में लग गया है जंक
और तुम्हारे नाम पर वसूली करने बालों की पौ बारह हो रही है।

Thursday, July 25, 2013

प्रवेश प्रारम्भ


हिंदी विभाग में इस वर्ष के प्रवेश प्रारम्भ हो रहे हैं, 

शिक्षण सत्र २०१३-१४ आप सबको शुभ हो 

Wednesday, December 7, 2011

अनुशासन हीन रहकर देश का गौरव बढ़ाएं


व्यंग्य      
     

नवीन चन्द्र लोहनी
        
जब कोई व्यक्ति लगातार  अनुशासन  तोड़ता है तो उसे बड़े होने, शक्तिमान होने साधन सम्पन्न  होने का आभास मिलता है। वह क्या आदमी जो बड़ा हो और   अनुशासन  भी न तोड़े। अब कई सांसदों ने पालाबदल लिया । पार्टी व्हिप को ठेंगा दिखाया । तब पता चला कि वे सब भी बड़े हैं । उनके भरोसे पार्टी के बडे़ दादा संसद में धोंसिया रहे थे । उन्होंने दादा लोगों की हवा निकाल दी । बाद में बड़े भोलेपन से कह रहे थे कि उन्हैं पार्टी  अनुशासन का  पता  नहीं  था  .
  क्या जमाना था जब टीचर कक्षा में होता था, गुरू जी के साथ-साथ चेले चेलियां तथागत भावों से उनकी बात मानते चलते लगता था मुर्दों की सभा हो या कि सारे रोबोट हों  ये भी कौन सी बात हुई कि कि गुरू जैसे हिले वैसे ही चेले हिले, जैसे गुरू चले वैसे चेले चले, जैसा गुरू ने कहा वैसा ही चेले, चेलियों ने किया । भला यह कौन सी जीव श ली हुई, आखिर वह चेला क्या जो गुरू की राह चले इसलिए कहा गया चेला वही जो गुरू से आगे निकल जाए या कि गुरू को लंगड़ी देकर आगे चला जाए ।
कुछ लोग गुरू चेलों की इस हालत पर खुश  होते हैं जाहिर है दूसरों को परेशन देख खुश  होने वालों की इस देश  में कमी नहीं है। पर खुश  होना क्या अंधों अंधे ठेलिया दोनों कूप परंत  वाली  बात जो कम से कम होनी ही चाहिए । देश  के कुआँ  खोदने वाले विभागों का भी उपयोग हो जाएगा और हमारे ज्ञान की परख भी । सो अच्छे गुरू चेले वह भी कहे जा सकते हैं जो या तो खुद कुए में गिर जाएँ  या ठेल-ठाल प्रतियोगिता संपन्न करते हुए एक साथ लुढ़क जाए। आखिर अंधे गुरू के अंधे चेले दोनों जैसे मिलते रहेंगे तभी गुरू परंपरा की दुहाई दी जा सकेगी । मेरा एक सुझाव यह भी है ऐसे लोगों को जो उपर कही गई परंपरा में आगे न पाए उन्हें   दण्डित करना चाहिए।
 असल में कक्षा तो वह है जब गुरू राम रहें तो चेला श्याम -श्याम  कहे । चेला वही जो गुरू से आगे चले । आगे चले ही नहीं गुरू को भी ठेले । जब गुरू पढ़ाने की चेष्टा करे तो चेला उसका मुखौटा बना तो ज्यादा अच्छा होगा । इससे पाठ के साथ चित्र कला का विकास होगा । गुरू जब गंभीर होकर पढ़ाए और आप उसे हंसाने का प्रयास करें तो इससे व्यंग्य तथा हास्य के साथ अभिनय कला का विकास होगा। गुरू जब लिखने को कहें और न लिखने पर बहस करें और जब व्याख्यान सुनने को कहें तो आप नोट्स नोट बनाने को कहें इससे वकृत्व कला का विकास होगा । संघर्ष का सिद्धान्त आखिर मार्क्स  यू ही नहीं सुझा गये । संघर्ष का मंत्र आखिर कितना प्रभावी होता है इसका भी पता चलेगा । इसका प्रतिफल हमें मिलना ही चाहिए।
देश  के अधिकारी कर्मचारियों के भरोसे छोड़ हमारे नेता अपने धंधों में लिप्त रहते हैं। चारा से लेकर कफन घोटाले करने के बाद भी उनका देश  में योगदान खत्म नहीं होता तो हमारे अधिकारी, कर्मचारी भी अपना योगदान देते हैं । 10 बजे के कार्यालय में 11 बजे आकर तदंतर गप, बहस, लंच, चाय और वापसी का क्रियाकर्म पूरा कर वे भी अनुशासन  हीनता का विकास करते हैं आखिर समय पर ही पूरी तरह देश  को विकसित कर देंगे तो उनकी नौकरी की जरूरत पर ही संदेह हो जाएगा। जाहिर है किसी भी अक्लमंद को अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने की जरूरत नही  है।
अब माता पिता का हाल देखिए खुद देर से सोएंगे बच्चे से समय पर सोने को कहेंगे, जो खुद खाएंगे पीएंगे वही बच्चों से मना करेंगे । जो खुद करेंगे वह बच्चों से न करने को कहेंगे। आखिर अनुशासन   तोड़ने का पाठ हम अपने माता-पिता के अनुशासन  तोड़ने से सीखते हैं कि बड़ा होने का मतलब स्वयं को अनुशासन   से बाहर रखने का ही है।
इसी प्रकार गुरूजन भी वही सब करते हैं जो वे छात्रों से न करने को कहते हैं । पढ़ना लिखना एम0ए0 करने के बाद न छोड़ पाए तो नौकरी मिलने के बाद पढ़ना बंद कर ही देते हैं। छात्रों से कहेंगे समय पर आएं खुद देर से आऐंगे, छात्रों से कहेंगे राजनीति मत करो खुद राजनीति करेंगे इससे भी हमें यह सबक मिलता है जो कहो वह मत करो, अर्थात अनुशासन शब्द में हो तो कर्म में तो कतई न हो, इससे रचनात्मकता का विकास होता है, आखिर बार-बार वही करना जो करणीय न हो और जो करणीय हो, न करना सबसे बड़ा लक्ष्य रखना चाहिए । सुपुत्र (सुपुत्री भी) वही हैं जो अपने माता पिता से कई कदम आगे हों । अतः हमें गुरूजन तथा माता-पिता से ये ही सारे गुर सीखने चाहिए, जिससे हम लायक सिद्ध हो सकें ।
अब देखिए घर पर फोन आने पर या किसी के घर आने पर माता-पिता कहते हैं बेटा कह दो घर में नहीं हूँ , बेटा फोन पर कह देता है ‘‘पिता जी कह रहे हैं कि वे घर पर नहीं हैं।’’ उत्तर में वह पिता के गुस्से का शिकार  होता है । इससे भी सिद्ध होता है कि पिता जो कहते पर असल वह वहीं न करने का कह रहे होते हैं। यह अनुभव भी आपको सबक सिखाने के लिए काफी है ।
सो मैं तो हर पढ़े और बडे़ आदमी से निवेदन करूंगा कि आप अपने स्तर पर अनुशासन तोड़ें, तोड़ने का अभ्यास करें, खुद तोड़ें औरों से तोड़ने का निवेदन करें,  जो न तोड़े  तो उन्हें अनुशासन  पालन करने का सबक सिखाएं । आखिर इस देश में अनुशासन का सबक सिखाते हुए गाधी बनने से तो कोई लाभ है नहीं  । सही काम कर माफी मांगने या पिटने से तो अच्छा है कि आप जब जहाँ  जैसे हो के आधार पर अनुशासन तोड़ने का यथासंभव अभ्यास करें । अगर अब भी आप अनुशासन तोड़ने का सबक नहीं सीख पाए तो क्या गाधी जी की तरह अपना जीवन  अनुशासन  के बढ़ावे के नाम पर चुका दें और गोली खाकर ही राम-राम कहें।



Tuesday, November 15, 2011

क्या और क्यों सुरक्षित हो भावी के लिए



 साहित्य क्यों लिखा जाना चाहिए और लिखा, छपा, सुरक्षित कर लिया गया साहित्य आखिर किस किस रूप में हमारे लिए मददगार हो सकता है इस पर भी पर्याप्त साहित्य लिखा जा चुका है । उस लिखे को सुरक्षित रखने की चिंता भी एक बड़ा मानवीय सरोकार रखती है कि तमाम तरह की सम्पतितयों के साथ-साथ हम अपनी आने वाली पीढि़यों को अपने समय और समाज की वास्तविकताओं से जुडे़ अनुभवों से जोड़ते हैं जिससे कि उनका चिन्तन न केवल समृद्ध हो अपितु आने वाले समय विशेष में वह बीते समय के उन अनुभवों को भी साझा कर अपने समय के अनुसार निर्णय ले सकें । तब यह कहना भी प्रासंगिक होगा कि हमारे समय समाज के जितने भी अनुत्तरित प्रश्न हैं उनके लिए बीते अनुभवों से हमें रेडिमेड फामर्ूला भले ही न मिलता हो तो भी एक ऐसा उत्तर तो समझ में आता है जो उस परिसिथति विशेष में उस समय विशेष में लोगों द्वारा लिया गया होगा और हम अपने समय समाज की परिसिथतियोें  के अनुसार किंचित परिवर्तन कर वैसा ही कुछ कर लें जैसा कि उस समय विशेष में हमारे पूर्वजों ने किया था, लेकिन आज अगर इसी महत्वपूर्ण बिंदु पर सोचा जाय तो हम इन दिनों अपने समाज में आ रही विविध रूप, अनुभव वाली विधाओं से क्या ऐसा ही कुछ विशिष्ट अनुभव या ज्ञान संजो रहे हैं जो कि वास्तव में इतना महत्वपूर्ण हो जिससे आने वाले दिनों में लोगों को कुछ नर्इ सीख व सोच मिल सके । तब समकालीन साहित्य के लेखन , उसके प्रश्नों, सरोकारोें, उसके सवालों को लेकर बात-चीत और बहस जरूरी हो जाती है कि आखिर ऐसा क्या लिखा जा रहा है जो साहित्य की तात्कालिक उपयोगिता के साथ-साथ भावी प्रासांगिकता को भी प्रस्तुत कर सके ।  
अगर हम भी इस सवाल पर मंथन कर सकें कि क्या इस समय जो भी लिखा जा रहा है और जो भी लिखा जाएगा यह सब तब और महत्वपूर्ण हो जाएगा जब कि हम नहीं रहेंगे या फिर तब हमारे लिखे को आने वाली पीढ़ी उसी तरह से लेगी, तब हमारी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि हम प्रकृति में विकास के नाम पर जो भी जोड़ पाए हैं वह सब एक थाती की तरह है लेकिन जो जो हम जोड़ सके हैं वह सब हमारी संतति के भविष्य के लिए न केवल महत्वपूर्ण हो बलिक वह ऐसा कुछ देता हो जिससे कि उसे अपने जीवन जीने में भविष्य में निर्णय लेने में वास्तव में आसानी हो । आखिर सम्पूर्ण विकास प्रकि्रया में अपनी भावी को सुखद जीवन देने की परिकल्पना ही है ।  मैं किसी घुटटी की जरूरत नहीं समझ रहा हूं जिससे सारे विकार मिट जाते हैं परन्तु जिस प्रकार का प्रदूषण सर्वत्र है और जिस प्रकार के दृश्य-अदृश्य विकार अपने आसपास हैं उनको परोसकर एक बीमार दृषिटकोण अगर हम अपनी भावी पीढ़ी को सौंपते हैं तो भी क्या यह माना जाए कि उससे उनका भविष्य सुरक्षित हो सकेगा तब यह चिंतन भी जरूरी है कि क्या लिखा जाय यह सोचना जितना महत्वपूर्ण है क्या न लिखा जाय यह सोचना भी जरूरी है । भोजन के साथ पथ्य की भांति, रेचक की भांति या कि स्वाद ही नहीं , सुस्वादु और स्वास्थ्यकर भी ।  इसलिए लिखे को, कह दिये गए को सुरक्षित रखना अगर जरूरी लगे तो वह कैसा और किस रूप में हो इस पर भी चिंतन जरूरी है । इसलिए क्या लिखा के साथ-साथ क्यों लिखा पर बहस जरूरी है ताकि उस लिख दिये गए का सही-सही मूल्यांकन हो और तब ही यह भी तय होगा कि इस लिखे को कब तक और क्यों सुरक्षित रखा जाय .................।
नवीन चन्द्र लोहनी

Thursday, October 13, 2011

व्यंग्य क्रिकेट पालिटिक्स है




                                                                                                                          नवीन चंद्र लोहनी

                उन्होंने कहा ‘कौन जीतेगा।’
बालकराम जानबूझकर बोले ‘कौन’
‘क्यों, सोए पडे़ हो क्या, चुनाव की बात कर रहे हैं। हारना जीतना और हो कहाँ  होता है।’
बालकराम ने कहा ‘ मैं क्रिकेट की बात समझ रहा था । फिर उन्होंने जोड़ा ‘ क्रिकेट कोई छोटी                                                  पालिटिक्स है क्या ।’
मैं बीच में कूद पड़ा ‘क्रिकेट खेल है और पालिटिक्स पालिटिक्स है ।’ अब दोनों ही मुझे अजनबियों की तरह देखने लगे  और  बोले क्या क्रिकेट क्रिकेट है और पालिटिक्स पालिटिक्स है । 
   ‘हाँ  मैंने कहा तो वे बोले ‘इसे यों समझो क्रिकेट पालिटिक्स है और पालिटिक्स खेल है।’ 
अब मैं राजनीतिविज्ञान का विद्यार्थी बन टपका‘ देखिए आप गलत घालमेल कर रहे हैं । राजनीति सिद्धान्त के लिए की जाती है जहाँ  राष्ट्र की सेवा के लिए अपना तन-मन-जीवन अर्पित कर जाते हैं इसके लिए वे अपनी जान तक अर्पित कर जाते हैं।’ 
बालकराम ने टोका‘ और दूसरे की जान भी ले लेते हैं ।’ 
वे बोले ‘तुम बेकार की बहस में पड़ गए हो । क्रिकेटिया  सीजन है क्रिकेट की बात करते हैं ।’
‘किकेट में कौन जीतेगा ।’
मैंने ज्ञान बघारा ‘जो अच्छा खेलेगा वह जीतेगा ।’
बालक राम ने प्रतिवाद किया, बोले ‘ यह सब फिक्सिंग के आधार पर होता है । इसमें ख्ेालने जैसी कोई बात नही है । वह सब तो दर्शकों के समय बिताने का काम है । असली बात तो भाई लोग कम्प्यूटरों, फोनों और दलालों के मार्फत तय करते हैं ।’
मैंने टोका ‘ बालकराम हर बार उल्टी बात करते हो ।’
बालकराम बोले ‘ लो फिर सुलटी बात करता हूँ , क्रिकेट कौन खेलेगा, यह नेता तय करते हैं । कौन नही खेलेगा, यह भी । किस-किस देश से कब-कब खेलेगा और कब नहीं यह भी नेता ही तय करते हैं । कब खेलने का माहौल है और कब नहीं यह भी नेता ही तय करते हैं । इससे सिद्ध होता है कि क्रिकेट नेता तय करते हैं, और नेता जो भी करते हैं वह राजनीति में आता है ।’   मैंने फिर अपनी सामान्य ज्ञान की शेखी बघारी ‘ चुप भी करो, यह सब क्रिकेट कन्ट्रोल बोर्ड तय करता है।’
बालकराम ने मेरी बुद्धि पर तरस खाया और बोले ‘वो तो क्रिकेट टीम पाकिस्तान भेजने के पक्ष में ही नहीं थे । सुरक्षा की चिन्ता क्रिकेट टीम के कप्तान को भी थी, फिर क्यों गए ।’ अब तक चुप वे बोले ‘क्योंकि माहौल ठीक है। 
मैने फिर मुंह  खोला ‘ क्योंकि वहाँ  फील गुड हो रहा है ।’
‘ ऐसी तैसी फील गुड हो रहा है मुशर्रफ जिस जबान से भारतीय टीम को जीत की बधाई देता है उसी जबान से आगरा से अब तक के सारे मामले को कश्मीर में घुसाड़ देता है, उसका आका भी तुरन्त उसे दोस्त कह कर नवाजता है और अपने फील गुड वाले मुंह ताकते रह जाते हैं ।’ 
मैंने कहा  ‘ लेकिन क्रिकेट तो अच्छी हो रही है ।’
          ‘तो अब तक किसने रोका था क्रिकेट टीम को, पाकिस्तान जाने से । पांच साल तो इस सरकार ने भी काट लिए । मेरा तो कहना है कि चुनाव न हो रहे होते तो भारत पाकिस्तान क्रिकेट भी नहीं हो रहा होता । यह सारा मामला चुनाव से ही जुड़ा हुआ है । न चुनाव होते । न फील गुड होता । न ही क्रिकेट हो रही होती ।  
मैं फिर दर्शन बघारने लगा ‘ जब जागो तभी सवेरा । क्या बुराई है अब क्रिकेट शुरू हो गया तो । इससे यही तो पता चलता है कि सम्बन्ध सुधर गए हैं ।’
‘ अरे न जनता ने कारगिल कराया, न ही मुशर्रफ को जनता ने बुलाया था । दो वर्ष तक सीमा पर सेना का  जमावड़ा खड़ा कर तनाव पैदा कराने वाले भी तो वे ही थे और उन्होंने ही देश के हजारों नौजवानों कर कारगिल की भट्टी में झोंका था । कभी कारगिल लड़ा के चुनाव जीत लो और कभी क्रिकेट करा के । यह सब पालिटिक्स है ।’
वे बालकराम से मुखातिब हुए बोले ‘ जब सब पालिटिक्स है तो चलो चुनाव पर बात करते हैं । क्या रखा है क्रिकेट में ।’ 
मैं उत्साहित होकर बोला ‘ कौन जीतेगा चुनाव में ’
बालकराम ने  पटाक्षेप करते हुए कहा ‘ पहले यह तो देख लो कि क्रिकेट में कौन जीतता है । इसी से यह भी तय होगा कि चुनाव में कौन जीतता है ।’
मैं अवाक् रह जाता हूँ  ।

                                                                                                                                   

Saturday, September 24, 2011

व्यंग्य राहत कमेटी में ट्रान्सफर करा दे बाबा



                              नवीन चन्द्र लोहनी

                 जब से पहाड़ पर वर्षा और बाढ़ आई है मेरे एक मित्र की पत्नी को अचानक अपने आप पर कोप हो आया। उनको पहाड़ से उतरे बहुत दिन नहीं हुए। यह दुर्घटना भी इसी साल घटनी थी और मित्र को भी इसी वर्ष स्थानान्तरण करवाना था। लाहौल विला कूव्वत। विगत् गर्मियों में अनेक शहरों को डुबा देने वाली बाढ़ के कारण उनका मन पहाड़ से मैदान की ओर हुआ था। ये कल्याण अधिकारी तब जनकल्याण की भावना से ओतप्रोत होकर पहाड़ से मैदान उतर आये थे, पर इस ऊपर वाले से उनको हमेशा नाराजगी रही, वे जहाँ भी ‘कल्याण‘ करने गये वहॉं न कोई बाढ़ आती है, न सूखा पड़ता है और न भूकम्प आते हैं न दंगे, न झगड़े, आखिर क्या करेंगे वे ऐसे पद को हथिया कर जो कोई जुगाड़ ही न बैठा सके।
              विगत् दिनों बाढ़ का प्रकरण जोरों पर चला उन्होंने अपने पढ़ने-लिखने के दिनों के साथी विधायक की ससुराल के दहेज में आये पैसे से मदद की और बाढ़ का दौर शुरू होते ही ट्रान्सफर करवा लिया, परन्तु रिलिविंग और ज्वाइनिंग का चक्कर जब खत्म होता तब तक बाढ़ उतर चुकी थी। राहत बंट चुकी थी। कल्याण अधिकारी के पास फिर मेज पर ऊँघने के सिवा कोई काम न था। बड़ी मुश्किल से पत्नी को मनाया कि इस बार नहीं तो अगली बार सही, बाढ़, सूखा, दंगा कुछ न कुछ होगा, फिर कल्याण कार्य करेंगे, फिर तो विधायक और मन्त्री को दी गयी ‘सहयोग राशि‘ वसूल लेंगे और कुछ प्लाट, मकान, गाड़ी के लिए भी सोचेंगे। पर उसकी परेशानी का कारण बर्षा की यह मार इतनी जल्दी आने की कोई भनक उसे होती तो वह ईश्वर कसम पहाड़ से कतई-कतई न उतरता। पहाड़ में वर्षा क्या  आई, भूकम्प उसके घर में आ गया। पत्नी कोप भवन में चली गयी। अब कहाँ वह विधायक उनके हाथ आता कि वरदान मांगती राम की तरह उसे वनवास दिया जाये जिसने तब उतनी देर स्थानान्तरण करवाने में लगा दी और अब है कि सुध नहीं ले रहा। अरे! किसी कमेटी-वमेटी में राहत-वाहत का काम दे दिला देता। कुछ उसे भी मिलता। वे उसके अनन्य मित्र थे, उस अनन्यता का कारण भी वे खुद थे जब भी ऐसी विपदाएॅं आती मौके-बेमौके उसकी सेवाओं का लाभ लेते रहते।
वे आये। अपनी पीड़ा, जनसेवा का दर्द, अपनी ललक सब उन्होंने बताई। भाई वे तो फिर कोप भवन में हैं, मैंने लाख कहा अरे क्या हुआ कभी तो यहाँ भी ऐसा कुछ होगा। घूरे के भी दिन फिरते हैं पर वह है कि मानती नहीं, कहती है कि स्वास्थ्य खराब होने के आधार पर ही सही तुरन्त पहाड़ पर स्थानान्तरण कराओं“ मैंने कहा ‘मित्र पिछली बार भी तो सम्भवतः ऐसा ही कुछ आपने किया था’ बोले उस बार माताजी के खराब स्वास्थ्य को लेकर मैंने यहाँ स्थानान्तरण करवाया था इस बार ‘वो’ कहती हैं कि स्वास्थ्य मेरा ही खराब बता दो पर किसी तरह पहाड़ पर स्थानान्तरण करवा लो। मैं क्या करूँ? आज तीन दिन से वे अन्न-जल बिना बैठी है मुझे तो लगता है कि कहीं कुछ बुरा न कर बैठे।“
मैं मित्र की कातरता समझ गया ”बोलो क्या करें, चलो मैं चलता हूँ, भाभी को कुछ तो बताएॅं कि इतनी जल्दी स्थानान्तरण नहीं हो सकता। हाँ वे घूमना ही चाहें तो उन्हें तुम पहाड़ पर घुमा ले आओ।“ उसने सिर पकड़ लिया बोला ”अगर वे ऐसे ही घूमना चाहती तो फिर मना क्या थी। वो तो मेरे घर वालों ने ही शादी के समय कह दी थी, जिसके बल पर दो लाख रुपये नकद दहेज लिया था वह मुझे डुबा रहा है मैं अगर समझता तो................।“
मैं उनके घर पहुँचा। वे पस्त हाल लेटी थी। मित्र की ओर देखकर गुस्से से उन्होंने आँखें उचकाईं। बोली ‘भाईसाहब, मेरा तो पल्ला ही ऐसे आदमी से पड़ा। क्या करूँ।’ मैंने सान्त्वना देते हुए कहा ‘परेशानी क्या हो गयी भाभी, ये तो मुँह लटकाये मेरे घर आया, मैं तो किसी अनिष्ट की आशंका से डरा हूँ। बताओ क्या बात हो गयी।“ वे बोली ”आपको पता नहीं है क्या, ये तो मेरी चुगली कर ही आए होंगे। देखो मैं तो कहती हूँ कि अरे जहाँ कोई काम नहीं वहाँ रहकर क्या करोगे। पिछले साल जब बाढ़ आई तो मैंने इनसे रिक्वेस्ट की कि मैदान में ट्रान्सफर कराओ, इनको जब बात समझ में आई तब तक बाढ़ जा भी चुकी थी। राहत बंट चुकी थी। ये क्या करते यहाँ आकर खाक। तब मैंने कहा छोड़ो ट्रान्सफर रुका लो, अब क्या यहाँ सड़ी गर्मी में मरने आए पर ये मेरी मानते कब हैं और अब भी इन्हें होश तब आयेगा जब वर्षा की राहत और पुनर्वास का काम पूरा हो जायेगा तब से वहाँ जायेंगे। इनकी अक्ल तो मेरी समझ से पथरा गयी है।’ मैंने कहा ‘तो कोई बात नहीं अगर आपको जनसेवा का इतना शौक है तो चलते हैं, कुछ मेडिकल से लोगों की ले लेते हैं कुछ और साथी चलेंगे, थोड़ी सेवा ही हो जाये जीवन सार्थक हो जाये।“
वे मुझ पर भी बिफर गयी, ‘मैं सोच तो रही हूँ, इनको क्या हो गया है, इनके तो आप जैसे ही सलाहकार होंगे। तभी। तभी तो ये आजकल ऐसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं। अरे इस शहर में कितनी संस्थाएॅं हैं जो गरीबों, बेसहारों, परेशान लोगों के साथ होने का दावा करती है। उत्तराखण्ड के कल्याण, सेवा के नाम पर इसी शहर में कितनी संस्थाऐं हैं कितने लोग गये वहाँ, ”हाँ अखबारों में जरूर यहीं बैठकर सरकार को कोस रहे हैं कि राहत ठीक नहीं चल रही कि उनको दुख है कि वे सबसे मदद की अपील करते हैं। अरे इस देश में कौन जन
सेवा के लिए इतना रोने लगा, किसी को अखबार से प्रचार चाहिए, किसी को वोट चाहिए, किसी को इसी बहाने पुरस्कार मिल जायेंगे, कोई पहाड़ पुत्र घोषित हो जायेगा और कोई सबसे बड़ा देश सेवक, गरीबों, असहायों का मसीहा। फिर वह चुनाव लड़ेगा, वोट मांगेगा, या फिर किसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्था से जुड़कर पुरस्कार लेगा या देगा दिलायेगा, कोई अपनी राहत समिति के बहाने घर, गाड़ी बना लेगा, कुछ ऐसे आप जैसे लोग भी होंगे जो अपना समय, पैसा बरबाद कर घर आयेंगे और बीबी से लड़ेंगे कि घी इतना खर्च कर दिया कि बच्ची की फ्राक अगले माह ले लेंगे, कि क्लब जाना बन्द करो या फिर इसी माह से कटौती शुरू। मैं लानत भेजती हूँ ऐसे आप जैसे लोगों पर।“
वह चादर तानकर फिर लेट गयी हैं। मेरे सिर पर अक्टूबरी प्रातःकालीन ठंड में भी पसीने की बूँदें उतर आयी हैं। मित्र भी सिर पकड़े पूर्ववत् बैठा है। मैं अकेला उसके ट्रान्सफर चिन्तन की नहीं इन सबकी चिन्ता में पड़ा वापस घर लौट जाना चाहता हूँ क्योंकि यह सच जब वे फिर बोलेंगी तो मैं चीखने लगूँगा, नोचने लगूँगा खुद को भी। आप सब कुछ के बाद भी उसके दर्द को समझें, हो सके तो उसका स्थानान्तरण फिर पहाड़ पर करवा दें, उसका भी भला हो जाये। जब डूबती गंगा में दो हाथ मारने का ही सवाल है और ज्यादातर कल्याणकर्मी यही कर रहे हैं तो मेरे इस मित्र ने ही क्या बिगाड़ा है।
...........................                                                                              

व्यंग्य जाँच जारी है...........




”                                                                                                  नवीन चन्द्र लोहनी
जाँच चल रही है, प्रतीक्षा कीजिए।“
”समिति व्यस्त है, कुछ सदस्य विदेश गये हैं, जाँच का कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है।“
”जाँच का कार्य कुछ दिन के लिए स्थगित, समिति के अध्यक्ष का देहावसान, नये अध्यक्ष के लिए जाँ....।“
”समिति का एक तिहाई काम पूरा, समय फिर पाँच साल के लिए बढ़ाया गया।“
”जाँच समिति बर्खास्त, नये सिरे से जाँच शुरू।“
ऐसी हजारों सुर्खियाँ साल भर में पाठकों को अखबारों, दर्शकों को दूरदर्शन तथा श्रोताओं को आकाशवाणी से परोसी जाती हैं। जाँच समितियों का कार्य बड़ा पेचीदा बताया जाता है। जाँच समिति में कुछ न कुछ नया लफड़ा खड़ा करने के स्रोत तलाशे जाते हैं, बहरहाल जाँच चालू रहती है........।
एक जाँच समिति बैठी, पता चला कि किसी दफ्तर की फाईलें कुतरी हालत में पायी गयी। सुबह से शाम तक दफ्तर का अमला व्यस्त रहा कि कैसे इन फाईलों को ”राइट आफ“ करवा दें। वर्ना जाँच समिति बैठ जायेगी। परन्तु अपने देष की दुरुस्त गुप्तचर व्यवस्था के कुछ पैने चष्मे वाले जाँच अधिकारियों को भनक लग गई। जाँच समिति बैठ गई। फिंगर प्रिंट विशेषज्ञ, जासूसी कुत्तों, के विशेष दस्ते साथ में लगाये। काम तेजी से चलने लगा। विदेशी हाथ की खोज शुरू हुई, दो-तीन चपरासी और क्लर्क नुमा पदधारी लापरवाही के आरोप में सस्पेंड हो गये। (उन्होंने दफ्तर के ऐन गेट पर अपना दूसरा धन्धा चला लिया।) परन्तु जाँच चलती रही। शहर में रहने वाले ”ब्लेक लिस्टेड“ लोगों पर नजर रखी जानी लगी। शहर तथा उसके आसपास रहने वाले विदेशियों के वीजा पासपोर्ट चेक हुए। विदेशी हाथ की सम्भावनाओं को खोजा गया। कुतरी फाईलों के चूरे को देष के सबसे बड़े रासायनिक शोध केन्द्र को भेजा गया। वैज्ञानिकों द्वारा इसमें तो महज किसी चूहे या ऐसे ही जानवरों द्वारा कुतरे होने की सम्भावना व्यक्त की गयी। चूहे के बालों, मल आदि का जिक्र भी रिपोर्ट में था। वैज्ञानिकों ने राय दी कि इतनी खतरनाक फाईलें कुतरने के बाद तो चूहा खुद व खुद मर गया होगा। (गोपनीय आख्या में यह बात भी अंकित की कि वह कोई भारत के नेता अफसर थोड़े ही हैं, सारा का सारा उड़ा जायें और मस्ती भी छानते फिरें।)
संसद में रिपोर्ट पर हंगामा हुआ। विपक्षी और पक्ष दोनों कश्मीर मुद्दे की भांति इस जाँच के एकदम खिलाफ थे, उन्होंने पाया कि इसमें चूहे को प्रतीक बनाकर हमारे चरित्र हनन की मानसिकता झलकती है। सदन में घ्वनिमत से प्रस्ताव पारित हो गया कि जाँच कार्य में लगे वैज्ञानिकों की रिपोर्ट एकदम अवैज्ञानिक है। इसमें किसी विदेशी हाथ की गन्ध आती है। वैज्ञानिकों को कठोरतम दण्ड देने का प्रस्ताव भी तालियों की गड़गड़ाहट व मेजों की थपथपाहट के बीज पारित हो गया।
नया वैज्ञानिक दल इस बात पर केन्द्रित कर दिया गया कि फाइल में चूहों की घुसपैठ की सारी सम्भावनाओं पर विस्तृत जाँच करे और सावधान भी कर दिया गया कि भविष्य में प्रजातन्त्र के प्रातः स्मरणीय ‘नेतावर्ग‘ पर दोष लगाने का हश्र पूर्व जाँच समिति की भांति होगा। सत्ता पक्ष ने अपनी ओर से सदन के नेता को यह प्रस्ताव भी दे दिया कि भविष्य में अगर कोई भी व्यक्ति चूहे, सियार, बिल्ली, गधे, कुत्ते, लोमड़ी या ऐसे ही किसी अन्य जानवर से उसका सम्बन्ध जोड़े तो उसकी नागरिकता समाप्त की जाये। (विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि यह रिपोर्ट आगामी सत्र में सदन के समय विधेयक के रूप में पारित करा ली जायेगी)
हाँ, तो इस बीच जब तक कि नये वैज्ञानिक दल पुनः कार्यभार सम्हालता जाँच में विदेशी हाथ की सम्भावनाअें पर खोज करने दल के अनेक सदस्य विदेशों में अनेक शहरों में घूम आये (ध्यान इसमें इतना रखा गया कि जिस जाँच कर्ता के पुत्र-पुत्रियों पत्नी-प्रेमिकाओं ने जो स्थान पूर्व जाँ कमेटी के बतौर सदस्य नहीं देखे थे उन्हें वहाँ भेजा गया, इसका कारण बताया गया कि कोई स्थान पूर्व से न देखे होने के कारण उनकी जाँच में कोई पूर्वाग्रह, स्थानीय मेलजोल दबाव नहीं चलेगा।) जांच समिति ने खूब कसरत की। विदेशी शहरों में घूमते हुए उन्हें वहाँ के दूतावासों से लेकर देश तक सारे लोगों ने हाथों-हाथ लिया। बताने की जरूरत नहीं कि उन्होंने विदेशी हाथ खोजने के बजाए पिकनिक का लुत्फ उठाने में ही अपना कीमती समय लगाया। बतौर भारतीय प्रतिनिधि वे कुछ बड़ी टोपियों और टोपों से मिल आये। (उनके फोटो दूरदर्शन में आप देख ही चुके हैं।
इन सब जाँच सूबों की रिपोर्ट की प्रतीक्षा से पूर्व फिर संसद में हंगामा होने लगा, विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाये कि इसमें गहरी साजिष है क्योंकि जिस अलमारी में ये फाइलें थी, वे बाहर निकले चूरे को वैज्ञानिकों को भेजने के बाद से बंद थीं। हंगामांे के कारण सत्ता पक्ष अपने साल भर के पिकनिक का नया बजट पास नहीं कर पा रहा था, अतः आलाकमान ने उच्चस्तरीय नेताओं के साथ विचार-विमर्श कर न्यायाधिकरियों के समक्ष अलमारी खोलने का निश्चय किया। यूँ तो बैठक में सारी स्थितियों का आकलन करने के बाद अलमारी खोलने मंे सत्तापक्ष की गत बिगड़ने के आसाार बाताए गये थे। पर ईमानदार शिखर पुरूष ने जब कांपते हाथों से दूरदर्शन की मौजूदगी में मुस्कराते हुए सील तोड़कर ताला खोला, तो अन्दर से अनेक तरह की गुर्राहटें आने लगी। भयभीत ”आलाकमान“ ने जब तक कुछ प्रतिक्रिया व्यक्त करने हेतु स्वयं को संयत किया अलमारी खुल चुकी थी। दूरदर्शन के कैमरामैन, स्वदेशी-विदेशी पत्रकार, पुलिसिए, सम्मानीय नेतागण देखते रह गये। कुतरी गई फाईल का नाम था ”राष्ट्रीय एकता“ और कुछ टोपियाँ, कुछ पगड़ियाँ, कुछ दाड़ियाँ, कुछ झण्डे और कुछ डण्डे थामें चूहे एक स्वर में चिल्लाए ”हम भारत के नेता नहीं हैं, अखबारों के लिए कल का हमारा यही बयान है।“ राष्ट्रीय एकता की यह अद्भुत मिसाल देखते ही आलाकमान के दूरदर्शी चेहरे की मुस्कान फीकी पड़ गयी।
पीछे खड़े पी0ए0 की सलाह को मानकार आलाकमान ने तुरन्त अलमारी को पुनः सील करने का फरमान जारी किया। अलमारी बन्द होते ही ”देश“ नाम फाईल जोर से बिलबिलाई। टोपियाँ, दाड़ियाँ, पगड़ियाँ फिर फाईलों में मुँह डालकर अपना भोजन तलाशने लगी। अलमारी में रखी ”राष्ट्रीय एकता“ वे ‘देश‘ नामक फाईलें आंसू बहाती रही।
आलाकमान ने एक और बैठक सम्बोधित की और जोर देकर कहा ”अखबारों की सुर्खियों में छपी वे सभी खबरें भ्रामक हैं जो देश व राष्ट्रीय एकता के संकट में होने की बातें बताती हैं। हमने देश व राष्ट्रीय एकता को अलमारी में सुरक्षित सील के अन्दर बन्द किया है ताकि कोई भी शरारती तत्व इनसे छेड़छाड़ न करे। कुछेक समाचार पत्रों में देश के ‘महान‘ लोगों को चूहे की शक्ल में फाइलें कुतरते दिखाया गया है, यह चरित्र हनन का प्रयास है। हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। जो भी अलमारी के अन्दर फाइलों के साथ देखे गये थे, वे सत्ता पक्ष के सैनिक हैं। उनकी राष्ट्रभक्ति पर उंगली उठाना देशद्रोह है। सम्पूर्ण कुतरन को जाँचने हेतु समिति गठित कर दी गयी है परन्तु यह अभी स्पष्ट कर दिया जाता है कि इसमें किसी भी जनतन्त्र समर्थक महान नेता या दल का हाथ नहीं है। विपक्षी दलों में कुछ विदेशी एजेन्ट जरूर हैं उनकी जाँच हेतु कमेटी बैठा दी गयी है जैसे ही रिपोर्ट प्राप्त होगी, आम जनता को सौंप दी जायेगी। ‘देश‘ और ‘राष्ट्रीय एकता‘ दोनों स्वस्थ हैं। कार्टनों और व्यग्यों के माध्यम से इन्हें अस्वस्थ कहने वाले पत्रों और पत्रकारों पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया जायेगा। कुतरन में लगे हर अपराधी को कड़ा दण्ड दिया जायेगा। .........हमारा देश महान है, हमारी परम्परा महा है......... बहरहाल अखबारों में छपी यह रिपोर्ट भी गलत है कि जाँच का काम बन्द कर दिया गया है, बल्कि जाँच को भिन्न-भिन्न सिरों से खोल दिया गया है। सभी समितियाँ जाँच कार्य में व्यस्त हो गयी हैं। हमें आज्ञा है जनता धैर्य से जाँच समिति के प्रतिवेदन की प्रतीक्षा करेगी। जाँच जारी है........................।
(बयान खत्म होते ही जनता ने देखा कि कुछ नेतानुमा लोग फिर ”राष्ट्रीय एकता“ वाली अलमारी में जाने के लिए बिलों की ओर दौड़ लगा चुके थे, अचानक दूरदर्शन में एक पट्टी चढ़ गयी ”रुकावट के लिए खेद है।“
.....................

Saturday, April 23, 2011

पहाड़ पर कुछ कविताएँ



पहाड़ की सुबह




कुनमुनाती धूप
पहाड़ों से घाटियों तक
छितर-छितर आयी है।


रात भर कोहरे से
डरा सहमा पहाड़
बहाने लगा है आंसू।


कल की सुबह की तरह
डैने फैलाये पंछी
उड़ने लगे हैं फिर।


खांसता-खखरता सूरज
फिर कल की-सी प्रचंड दुपहरी की
दिल देगा याद


अभी सुबह ही है
और लोग घरों के अन्दर
कल के घाव धो-पोंछ रहे हैं।


जिद्दी रात


धूप/सुबह-सुबह बीन लेती है
शरारती रात के फैलाये सफेद मोती


पर जिद्दी रात
सुबह से पहले ही
हर रोज
‘फिर खोल देती है
लड़ी मोतियों की’







पहाड़


धुएं की सफेद / मटमैली
चादरें लपेट / बूढ़ा पहाड़
सफेद बालों के बीच
अपना रोता कलपता चेहरा
खोजता है।
दुःख की बरसात / हो गयी है शुरू
और चौतरफा उग आये है
नये-नये नाले।

नवीन चन्द्र लोहनी

Tuesday, October 12, 2010

हिंदी हैं हम।

हिंदी हैं हम

                        पिछले कई महीनों से एक ही भूत सवार था कि राष्ट्रमंडल खेलों जैसे आयोजन में भारत की भाषा हिंदी के प्रयोग को लेकर क्या हो.... सभी मित्रों से कहा , लिखा, मेल किए, गाहे बगाहे फ़ोन किए ... मिले .... अपना पागलपन कई तरह से बांटा ....... कुछ सथियौं ने अपनी ओर से भरपूर सहयोग दिया .... कुछ को लगा बकता है, कुछ ने कहा हिंदी मास्टर है...... इनकी सोच एईसी ही है आखिर अंतर्राष्ट्रीय आयोजन है भारत में अब अंग्रेज खूब हो गए हैं वे सत्ता में हैं ......वे जनता की जबान न जानने से ही बड़े दीखते हैं ..... उनकी ही भाषा चलेगी जयकारा भी इस देश में उनका ही होता है जो अंगरेजी बोलता है ......हद तो तब हुई जब सरकार ने इसी कार्य के लिए रखे एक सरकारी अधिकारी ने कहा की वह उत्तर प्रदेश का है हिंदी जानता है पर हिंदी प्रयोग के समर्थन में न बोलेगा न लिखेगा....... वह बेहद तल्ख़ टिप्पणी कर रहा था ऐसे आयोजनों में हिंदी प्रयोग को लेकर ...... कुछ सांसदों की मदद मिली उन्होंने संसद में सवाल पूछे ...... सरकार के कण तब भी पूरी तरह से नहीं खुले .....कुछ हिंदी उद्घाटन समारोह में हिंदी सुनी ..... पर जब कलमाड़ी जी से लेकर प्रधानमंत्री जी और राष्ट्रपति जी तक अंग्रेजों के राजा रानी को उन्ही की जबान में बोलते सुने गए तो एहसास हो गया कि अंग्रेजों के राष्ट्रमंडल में उनकी जबान बोलने का अलग इनाम मिलता होगा .... उद्घाटन समारोह में तो हमारे सारे नेता हिंदी भूल ही गए ....अब समापन समारोह होगा ... समापन समारोह में भी नेता जी लोग फिर से वही करेंगे पूरी उम्मीद है ... आखिर अंग्रेजों को प्रभवित करना है दुनिया को बताना है की आपकी जबान की बदौलत ही हम जबान वाले हैं ........
               भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को इन समारोहों में हिंदी में संबोधन करने के सुझाव कई संस्थाओं की ओर दिए गए थे ......पर जब अंग्रेज सामने हो तो हम अपनी जबान क्या याद रख पाते हैं हमारे नेताओं के साथ भी यही हुआ होगा ......... जय हो .... जय हो... कार्यक्रम हिंदी में हो सकते हैं ..... नेताओं को जनता का मनोरजन करना होता है ..... उनकी जबान हिंदी नहीं हो सकती ..... वोट मांगते समय वे हिंदी बोल सकते हैं ..... शायद उनको अब भी हिंदी मांगने की ही भाषा लगती हो .....अपने देश की सरकारें कौन सी भाषा बोलती हैं यह तो देख लिया .... आप भी उनसे सहमत हैं नहीं????????? तो यह संवाद जारी रहेगा जब भी आपको लगे कि देश की भाषा बोली जाए ,,,, सुनी जाए,,,,, लिखी जाए ,,,, तो आवाज दें ,,,,, .........



एक सही आवाज देने के क्या... हम तैयार हैं .........


आखिर हिंदी हैं हम।


--


प्रोफ.नवीन चन्द्र लोहनी


09412207200

Saturday, September 18, 2010

उस दिन तक चाहिये आग

पूर्व प्रकाशित कविता
उस दिन तक चाहिये आग





लोहार के आँफर१  सी धधकती
तेरी छाती
अभी हो भी क्यों ठण्डी।
अभी, जबकि तुम्हारा
द्रोपदी की तरह होता हो चीरहरण सरे आम
और सीता की तरह
फिर गुजरना पड़ता हो अग्नि परीक्षा से।


तुझे तो अभी सजानी हैं
कुदाल ओर दराँती की
पूरी की पूरी जमात
और खोद, कूट, पीट, काट-छाँट कर
बसाना है एक नया संसार।






जहाँ भडुएं२  में खदबदाती दाल-सी
तेरी आत्मा पिफर चाहती हो शान्ति।
तू रच बस सके पूरी तरह
उगा सके अपनी पसन्द के फूल-फल
बीन सके काँटे और खरपतवार।






वहाँ,
वहाँ तक है तेरी यात्रा
जहाँ तू पूरी तरह हो सकेगी
अपने आप में पूर्ण
तब,
तब तक तो बरकरार रखनी है यह आग


जो माँग सके हिसाब इन सब से
जो कहीं राम हैं, कहीं कृष्ण
कहीं कंस और कहीं रावण।





-------------------

१-आँफर ;भट्टी

२ भडुआ भड्डू ;एक बर्तन

Monday, August 23, 2010

राष्ट्रमंडल खेलों में भी हिंदी का भाषण

हिंदी को बढ़ावा दिया ट्रिब्यून एवं गुरमीत सिंह ने

हिंदी हैं हम!


Posted On August - 20 - 2010

खबरों की खबर


गुरमीत सिंह


स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से देश को लगातार सातवीं बार संबोधित करते प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को देखकर एक बार फिर हिंदी का ख्याल मन में आया। टीवी पर साफ दिखा कि प्रधानमंत्री हिंदी में जो भाषण पढ़ रहे थे वह देवनागरी लिपि में नहीं उर्दू लिपि में लिखा हुआ था। इसमें कोई एतराज वाली बात नहीं है।अब का तो पता नहीं लेकिन पहले तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का हिंदी का भाषण रोमन लिपि में लिखा जाता था। प्रधानमंत्री की तरह ही पाकिस्तान में शुरूआती शिक्षा लेने वाले बहुत से हमारे बुजुर्ग अभी भी देवनागरी लिपि की जगह उर्दू लिपि में ज्यादा सहज हैं। दूसरी तरफ आज की पीढ़ी उर्दू के बहुत से शायरों को देवनागरी लिपि में पढ़ती है। वैसे भी मैं तो मानता हूं कि हिंदी व उर्दू जुबान में कोई अंतर है ही नहीं और दोनों का झगड़ा केवल सियायत की उपज है।


यह एक संयोग ही है कि स्वतंत्रता दिवस के आसपास ही एक बार फिर हिंदी का सवाल चर्चा में आया है। 21वीं सदी में इस बात पर सभी एकमत हैं कि भारत दुनिया में एक बड़ी ताकत बनकर उभर रहा है। फिर भी अभी तक देश की भाषा हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने का लक्ष्य हमारी सरकार हासिल नहीं कर पाई है। वर्ष 2007 में तो इसी लक्ष्य के साथ केंद्र सरकार ने आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन का उद्घाटन समारोह न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय में किया था और इस समारोह में संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान-की-मून ने हिंदी में भाषण देकर हिंदी-प्रेमियों को बहुत उम्मीदें बंधा दी थीं। लेकिन इस सम्मेलन के बाद भी हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र में औपचारिक प्रस्ताव पेश नहीं हो सका है। पिछले सप्ताह ही राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान यह सवाल उठा जिसके जवाब में विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने संसद को बताया कि भारत हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में एक आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए लगातार अन्य देशों के साथ पैरवी कर रहा है। भारत द्वारा किए जा रहे प्रयासों को लाभदायक बताते हुए कृष्णा ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र हिंदी में एक साप्ताहिक कार्यक्रम बना रहा है जो उसकी वेबसाइट पर उपलब्ध रहेगा और इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो पर भी इसका प्रसारण होगा।


कृष्णा ने यह भी बताया कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर शामिल करने में कई वित्तीय और प्रक्रियागत बाधाएं हैं जिन्हें औपचारिक प्रस्ताव पेश करने से पहले दूर करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि प्रक्रिया के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र महासभा को 192 सदस्य देशों के बहुमत से एक संकल्प पारित करने की जरूरत होगी। इसके बाद प्रस्तावक देश के तौर पर भारत को भाषांतरण, अनुवाद, मुद्रण और दस्तावेजों संबंधी अतिरिक्त खर्च को पूरा करने के लिए विश्व संस्था को पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने होंगे। कृष्णा के मुताबिक सदस्य देशों को हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर शामिल करने में आपत्ति नहीं हो सकती लेकिन वे इससे होने वाले खर्च के बढ़ते बोझ को बांटने के अनिच्छुक होंगे।


चलिए मान लिया कि संयुक्त राष्ट्र में औपचारिक प्रस्ताव पेश करने में भारत को कुछ दिक्कत आ रही है लेकिन भारत में हो रहे राष्ट्रमंडल खेलों के माध्यम से हिंदी को सारे विश्व के सामने प्रोजेक्ट करने का अवसर हमारी सरकार क्यों गंवा रही है? हमारे देश में आने वाले विदेशी अकसर इस बात पर हैरान होते हैं कि हम अपनी भाषा की उपेक्षा क्यों करते हैं? पंजाब विश्वविद्यालय में भी पिछले वर्ष हालैंड से आए एक दल ने सभी साइनबोर्ड अंग्रेजी में देखकर यह सवाल उठाया था। जिसके फौरन बाद कुलपति ने सभी साइनबोर्ड अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी व पंजाबी में भी लगवा दिए हैं। राष्ट्रमंडल खेलों में तो काफी बड़ी संख्या में विदेशी मेहमान और खिलाड़ी आएंगे फिर वहां राजभाषा की उपेक्षा क्यों?


अच्छी बात है कि क्रांति के शहर कहे जाने वाले मेरठ से इस उपेक्षा के खिलाफ आवाज उठ गई है। मेरठ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की पहल पर पहले 7 जुलाई को राजभाषा समर्थन समिति के बैनर तले राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान हिंदी के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए एक अभियान चलाने का संकल्प किया गया और उसके बाद अन्य संस्थाएं भी इस अभियान से जुड़ी है और 27 जुलाई को ‘ राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी’ विषय पर अक्षरम, राजभाषा समर्थन समिति और वाणी प्रकाशन द्वारा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 27 जुलाई को आयोजित संगोष्ठी में कई सांसद ,पत्रकार, साहित्यकार व कमेंटटर एक मंच पर आए थे। इस मंच से खेलों की वेबसाइट तुरंत हिंदी में भी बनाने, उद्घाटन समारोह और समापन समारोह जैसे कार्यक्रमों में भारत की भाषा और संस्कृति का प्रतिबिम्ब होने, भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को इन समारोहों में हिंदी में संबोधन करने,खेलों की कमेंटरी व अन्य सामग्री में हिंदी के भी प्रयोग के सुझाव दिए गए हैं। लेकिन इन सुझावों को लागू कराने के लिए संघर्ष की नौबत क्यों आए? आखिर हिंदी हैं हम।


अब तो घोटालों के बाद राष्ट्रमंडल खेलों की कमान भी प्रधानमंत्री ने अपने हाथ में ले ली है। क्या वे राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान हिंदी को चमकने का अवसर देंगे? यदि हम अपने देश में ही हिंदी को बढ़ावा नहीं दे सकते तो संयुक्त राष्ट्र में किस मुंह से हिंदी की पैरवी करेंगे? प्रधानमंत्री जी यदि स्वतंत्रता दिवस की तरह राष्ट्रमंडल खेलों के उद्घाटन समारोह में भी उर्दू में लिखा हिंदी का भाषण दें तो हम हिंदी-प्रेमी जरूर बाग-बाग हो जाएंगे।


प्रोफ.नवीन चन्द्र लोहनी


09412207200

Tuesday, August 10, 2010

पूर्व प्रकाशित


कविता                  सच और झूठ

मुझसे पिता ने कहा


पिता को उनके पिता समझा गये होंगे


‘‘सत्य बोलना पुत्र,


सत्य की सदा विजय होती है।’’


तब कौन सा युग-धर्म


सिखा रहे थे पिता अपने बेटों को।


अब भी क्या वैसा हो होगा,


सत्य का प्रतिरूप?


जैसा कि दादा, परदादा


सिखाते रहे थे अपने बच्चों को,


और जैसा पिता समझाते रहे हमें।


कि सूर्य एक है


ऐसे ही सत्य है एक, शाश्वत।


सब बातें, सारी किताबें के


उलट - पुलट हो रहे हैं अर्थ,


कि ‘सत्य बोलना’ जुर्म सा हो गया हो


अब, जबकि,


तब क्या हम भी यही


सिखायेंगे बच्चों को?


क्या मजबूरी होती है पिताओं की


कि वे बच्चों को सिखाना चाहते हैं,


केवल सच, जबकि


आज बन गया है एक जुर्म


सच बोलना, सुनना या देखना।


झूठ है कि


सच बोलकर ही जी जा सकती है


खुशनुमा जिन्दगी।


आज जबकि हम देख रहे हैं,


सच के मुँह पर है ताला,


और झूठ रहा है खिलखिला,


सच्चों को जीने की देता है शिक्षा


तब हम क्या सिखायेंगे बच्चों को।


जबकि बच्चे जन्मते ही


हो जाते हैं सयाने।


कि पकड़ सकते हैं


मुंह पर ही हमारा झूठ।                डॉ. नवीन चन्द्र लोहनी

Friday, August 6, 2010

जरूरी है बदले दीक्षान्त समारोह के ड्रैस कोड

हमारे देश के शिक्षा तंत्र पर जब भी सवाल उठते हैं तो उनका सम्बन्ध कई प्रकार से किये जा रहे  परिवर्तनों से भी होता है पर एक नया विवाद विश्वविद्यालयों में दीक्षान्त समारोहों मे पहनी जाने वाली धज ( ड्रेस) पर है। सवाल है की  हम आखिर वह सब क्यों पहनते हैं जिनका भारतीय विश्वविद्यालयों की किसी भी परंपरा से कोई भी संबंध नहीं है -------------------------
       जरूरी है बदले दीक्षान्त समारोह के ड्रैस कोड

                   विश्वविद्यालयों में दीक्षान्त समारोहों मे पहनी जाने वाली धज पर नई बहस शुरू हो गई है। हम आखिर वह सब क्यों पहनते हैं जिनका भारतीय विश्वविद्यालयों की किसी भी परंपरा से कोई भी संबंध नहीं है? इस पहनावे का विरोध न तो परंपरागत सांस्कृतिक रक्षा के दावे करने वाले दलों, समूहों की तरफ से हो रहा था न किसी कथित अधुनातन वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले दलों से। इस पहनावे के कपड़े की उपयोगिता स्वास्थ्य की दृष्टिकोण से भी तब शायद इतनी उपयोगी न हो जब इसे ग्रीष्म काल में पहना जाए। यह पहनावा मात्र परंपरा के नाम पर ही चल रहा है। कोई भी ऐसे ड्रैस कोड सामान्यतया तब तक चलते हैं जब तक इन पर कोई कारगर बहस शुरू नहीं होती।
                  केन्द्रीय मन्त्री जयराम रमेश द्वारा इस ड्रैस कोड को लेकर जिस रूप में प्रतिक्रिया दी यह विमर्श नई बहस की अपेक्षा रखता है। इस सन्दर्भ में पूर्व केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी द्वारा उनका समर्थन करना या फिर छत्तीसगढ़ के गुरू घासीराम विश्वविद्यालय द्वारा अपने विश्वविद्यालय के समारोह में कुर्ता, पायजामा तथा पगड़ी को प्रयोग करने से एक नई चर्चा शुरू हुई है। मेरा मानना है कि इस परिप्रेक्ष्य में विचार करने की नितान्त आवश्यकता है कि विश्वविद्यालय अपने दीक्षान्त समारोह में किस प्रकार की वेशभूषा धारण करें।
               अपने अध्ययनकाल से लेकर आज तक मैं दीक्षान्त समारोह में पहने जाने वाले भारतीय विश्वविद्यालयों की ड्रैस देखकर चैंकता रहा हूँ। भारतीयता की दुहाई देने वाले दलों की सरकारों के रहते हुए भी इस ड्रैस कोड को नही बदला गया और आज तक लगभग सभी विश्वविद्यालय एक ऐसे पहनावे को दीक्षान्त समारोहों के मौकों पर पहनते हैं जिसको पहनने के लिए उनके पास तर्क सम्मत आधार नहीं है और हम ऐसे कार्यक्रमों में एक गैरभारतीय ड्रैस पहनते रहे। यह विवाद भले ही जयराम रमेश की तात्कालिक टिप्पणी के कारण उठा हो जब उन्होंने इस पहनावे को लेकर आपत्ति उठाई परन्तु इस बात पर गौर होना निहायत जरूरी है ।
                 यह अचरज की बात है कि किसी भी देश के विश्वविद्यालय, महाविद्यालय अथवा वहाँ दक्ष हो रहे युवक युवतियाँ तथा शिक्षक सालों साल जिस प्रकार के पहनावे को पहनते है और जिस पहनावे के साथ वह अपनी उपाधियों के लिए अध्ययन अध्यापन करते है उपाधि वितरण किए जाने वाले समारोह में वह ड्रैस कोड लागू नहीं होता। न ही कोई ऐसी ड्रैस अमल में लाई जाती जो किंचित रूप में उस विश्वविद्यालय या उस क्षेत्र की गौरव गरिमा के बारे में अपना पक्ष रखती हो। न ही किसी राज्य अथवा क्षेत्र के पहनावे को इस अवसर पर सरकारी तौर पर मान्यता प्राप्त है। यद्यपि विश्वविद्यालयों में किसी भी तरह के ड्रैस कोड को लेेकर अक्सर बहसें रहती हैं गत वर्षों में हमारे विश्वविद्यालय समेत भारत के कई अन्य विश्वविद्यालयों तथा संस्थानों में जब भी छात्र-छात्राओं को लेकर किसी डेस की लागू करने की बात आरंभ हुई तो हर बार उसका विरोध हुआ, परंतु प्रायः आज तक इस पहनावे को लेकर छात्रों तथा छात्र संघों की ओर से भी कोई विरोध सुगबुगाहट नहीं दिखाई दी।
                 विद्यार्थी जीवन से लेकर अब तक इस पहनावे को लेकर एक विचित्र आकर्षण-विकर्षण महसूस करते रहने के बाद आज इस बहस को देखकर लगता है कि ऐसा और भी कई लोग अनुभव कर रहे थे। एक केन्द्रीय मन्त्री और एक विश्वविद्यालय द्वारा इस क्षेत्र में पहल की गई तो मुझे प्रतीत हुआ कि यह वास्तव में यह मेरे मन की बात हो रही है। मैं यह समझता हूँ कि शिक्षण संस्थानों को इस सन्दर्भ में नए सिरे से सोचना चाहिए कि अन्ततः इस परम्परागत गैर भारतीय ड्रैस कोड को जो किंचित ईसाई धर्मावलम्बियों के ड्रैस कोड के नजदीक है को षैक्षणिक संस्थाओं के सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में चलाए रखने की क्या आवश्यकता है? इस ड्रैस कोड के नाते न केवल आयोजन महंगा बैठता है अपितु एक विचित्र सी भंगिमा वैचारिक लोगों में चलती रहती है कि ड्रैस कोड इस रूप में क्यों?
                    किसी भी औपचारिक आयोजन में औपचारिक ड्रैस कोड की महती भूमिका हो सकती है परन्तु उस औपचारिकता में कितनी सहजता, सरलता और आत्मीयता है इसका भी परीक्षण करना आवश्यक है। परम्परा पोषण के नाम पर जिस ड्रैस को हम सालोंसाल निभाते आए है वह ड्रैस किंचित भी अपने पारिवारिक, सामाजिक या भारतीय समाज को परिलक्षित करने वाली नहीं दिखाई देती है।
               यद्यपि गाउन को लेकर बहस होने के बाद नई टिप्पणियां भी आरम्भ हो गई है। पारम्परिक गाउन और हुड के विरोध के बाद विलासपुर के गुरू घासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय में अपै्रल माह में अपने दीक्षान्त समारोह में इस पारम्परिक पहनावे की बजाय छत्तीसगढ़ी लिबास खुमरी व कुर्ता पायजामा पहनाने का निर्णय लिया है। युवकों के लिए टोपी कुर्ता पायजामा तथा युवतियों के लिए इस ड्रैस के लिए साड़ी निर्धारित की गई। इस विश्वविद्यालय के कुलपति के अखबारों में प्रकाशित बयानों के अनुसार उन्होंने दीक्षान्त समारोह में भारतीय एवं क्षेत्रीय संस्कृति की झलक होने की बात कही है और गाउन पहनने को  अंग्रेजों की परम्परा से जोड़ा है। यद्यपि केन्द्रीय मन्त्री जयराम रमेश के द्वारा ड्रैस के विरोध को ईसाई समुदाय के लोगों ने किसी खास पक्ष या विपक्ष के रूप में नहीं लिया तथापि ईसाई समुदाय के संरक्षक के तौर पर किसी एक संस्था के व्यक्ति द्वारा ड्रैस के अपमान की बात भी प्रकाश में आई है।
               विश्वविद्यालयों में वैचारिक खुलापन और एक तार्किक क्षमता सम्पन्न विद्यार्थियों की बात की जाती है और भारतीय विश्वविद्यालयों में बहस मुबाहिमा कई मुद्दों पर अक्सर होता रहा है, परन्तु यह एक ऐसा फैसला था जिसका विरोध लगातार पहनावे के बावजूद नहीं हुआ। देश के प्रतिभा सम्पन्न विश्वविद्यालयों में भी इस पहनावे को लेकर कोई आपत्ति नहीं सुनाई दी। केन्द्रीय पर्यावरण मन्त्री जयराम रमेश द्वारा भोपाल में इस ड्रैस पर जो विरोध प्रकट किया गया वह इस बार चिन्गारी का काम कर गया।
                  ऐसा प्रतीत होता है कि विश्वविद्यालयों में पारम्परिक अवधारणाओं के लिए पर्याप्त जगह होती है फिर चाहे वह पाठ्यक्रमों के निर्धारण की बात हो या फिर अन्य कई मुद्दे जिनमें विश्वविद्यालयों के संचालन सम्बन्धी विविध परम्पराएं भी है। सामान्यतया विरोध करने के राजनैतिक कारण तुरन्त खोज लिए जाते है परन्तु इस बार अभी तक ऐसी सुगबुगाहट नहीं दिखाई दे रही है कि इसको किसी पार्टी या किसी नेता का बयान कहकर टाला जा रहा हो। ऐसा प्रतीत होता है कि यह सुगबुगाहट कई लोगों के मन के भीतर पहले से थी कि हम इस परम्परागत ड्रैस को क्यों पहनते हैं? एक प्रारम्भिक शुरूआत हो भी गई है और एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय से इसकी शुरूआत होने के अपने तर्क है परन्तु अगर आजादी के 63 वर्ष बाद भी हम अपने विश्वविद्यालयों में उपाधि प्रदान करने की औपचारिकताओं में पहनावे को भी अपनी तरह से निर्धारित नहीं कर पाए तो यह मानसिक गुलामी जैसा ही है। अतः यह प्रतिरोध इसी रूप में इसलिए भी कारगर लगता है कि भले ही औपचारिकता का ही समय हो ऐसे अवसर पर भी हम अपनी जड़ों की तलाश सही तरह से कर सकते हैं और देर से ही सही ऐसी मुहिम जब भी कहीं से शुरू होगी उसका स्वागत करने वाले बहुत सारे लोग इस समाज में मौजूद है।
                विश्वविद्यालयों में छात्र-छात्राओं के ड्रैस कोड की तरह इस परम्परागत पहनावे के बदलाव की शुरूआत मध्य प्रदेश से हो रही है और उसकी शुरूआत एक कांग्रेसी मन्त्री से प्रारम्भ हुई है। समर्थन में मुरली मनोहर जोशी का आना भी एक शुभ संकेत है कि राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय प्रश्नों को लेकर किंचित दलों में वैचारिक साम्य रखने वाले लोग भी है। इस विरोध का सबसे प्रभावी पक्ष यह है कि इसका स्वागत भले ही जोर शोर से न हो रहा हो परन्तु इसके विरोध की सुगबुगाहट कहीं से नहीं है। अतः यह समझा जा सकता है कि देर से ही सही एक उचित सम्भावनापूर्ण शुरूआत हो चुकी है और उसकी सीमाओं का विस्तार समय के साथ होता रहेगा।

नवीन चन्द्र लोहनी




Saturday, July 24, 2010

क्या होगा पुतला जलाने भर से

आपको याद है कि कोई कसाव भी है भारत सरकार जिसकी सुरक्षा पर करोड़ों लुटा चुकी है और देश  के किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति से उसकी सुरक्षा की चिन्ता सरकार को अधिक है जिसकी अब पाकिस्तान वास्तव में चिन्ता कर रहा है आखिर क्या पाकिस्तानी हुक्मरानों को याद आ ही गई कि उनके गुर्गों  में कसाव अभी जिन्दा है,  टी० वी ० से लेकर समाचार पत्र मंत्री से लेकर सन्तरी  तक सब  चिन्तित आखिर कब तक होगा यहाँ सब  कब तक ..................................................   
                      क्या होगा पुतला जलाने भर से
          पिछले साल होली के अवसर पर देश  की आथिर्क राजधानी मुम्बई के हमले के आरोपी कसाव का पुतला जलाया गया॔ हिन्दी के टेलिविजन चैनलों पर यह खबर ऎसे परोसी गई माना कि अब कसाव या उस जैसे सारे आतंकवादियों को खत्म कर दिया गया हो और कसाव नामक यह अंतिम आतंकवादी था उसको भी आज खत्म कर दिया गया है । इसके साथ ही यह भी कहा गया कि मुम्बई के आतंकवाद विरोध का यह अपना तरीका है । कसाव का पुतला बम्बई में जलाया गया, आलेख के प्रकाशित  होने तक देश के अन्य कोनों से भी ऎसी घटना खबर आ जाए, परन्तु कसाव के पुतले या किसी भी पुतले के दहन से वास्तव में कुछ भी बदलता है । हमारा यह निरीह आक्रोश  ही तो है जब आम आदमी अपने गुस्से का इजहार किसी और शक्ल में नहीं कर पाता तो ऎसे तरीकों से अपने को अभिव्यक्त करता है अगर इसमें इसी प्रकार का आक्रोश  ही हो तो भी हमारा काम क्या इतने भर से सम्पन्न हो जाने वाला है ।
                    भारतीय राजनैतिक परिदृय में पुतला जलाना एक राजनैतिक क्रियाकर्म  सा हो गया है । यह सब कई बार अपना आक्रोश  अभिव्यक्त करने के लिए होता है परन्तु अब तो कई बार यह सब इसलिए भी होता है ताकि उस व्यक्ति या संगठन को इस बहाने अपना प्रचार करने का आसान तरीका मिल जाता है । यह तरीका अब केवल राजनीतिक दलों तक ही नहीं है अपितु कई कथित सामाजिक संगठन, जातीय, धार्मिक विद्यार्थी  संगठन भी इसी तरह का प्रचार का टोटका अपनाने में लगे हैं ।
                  जो भी हो, कसाव जैसे आतंकवादियों के प्रति अपने गुस्से का इजहार करने का एक तरीका जनसामान्य ने अपनाया यह घटना अपने आप में एक संकेत तो देती ही है कि हम किस प्रकार आतंक से पीडि़त हैं और पुतला जलाकर सांकेतिक तौर पर ही सही अपने गुस्से की अभिव्यक्ति कर रहे हैं । पर सवाल यह भी है कि हमारे देश  में सत्ता पर काबिज लोग भी क्या जनमानस की इस व्यथा से परिचित हैं, क्या विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका में इन घटनाओं का कोई असर होता है । अगर वास्तव में होता है तो क्या तब भी यह संभव है कि संसद में हमले के आरोपी को सजा की घोषणा हो जाने के बाद भी पत्रवली इतने लम्बे समय से किस कारण अब तक देश  के सवोर्च्च पदधारी के पास पड़ी हुई है । क्या संकेत हैं इस सबके कि हो सकता है एक दिन सिद्ध हो जाएगा कि कसाव देश  की सुरक्षा में सैंध लगाकर तीन दिन तक पूरे विव में भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था की पोलपट`टी खोलने बाले दल का सदस्य था ।
            जनधन की हानि के अलावा देश  पर आक्रमण करने वाले आतंकियों के दल के एक सदस्य और अब तक पकडे़ जा सके एकमात्र् जीवित आतंकी के प्रति हमारी सरकार का आज क्या रवैया है, उसके प्रति देश  के कानून में क्या कोई नरमी बरतने के पैंच मौजूद हैं, नही तो इस आतंकी के कबूलनामे को विवविरादरी के सम्मुख रखकर उसको अकल्पनीय सजा देकर इस दिशा   में कदम बढ़ाने की ओर कोशिश  करने वाले भीतरी तथा बाहरी आतंकियों के लिए सबक देने का हमारा प्रयास और तेज तथा कारगर नहीं होना चाहिए । पाकिस्तान के हुक्मरान, सेना तथा वहॉं के आतंकीयों की मिली जुली कोशश की स्वीकृति चाहे मुशरर्फ भारत में आकर कर गए हैं यही नहीं पूर्व प्रधान मंत्री  बेनजीर भुट`टो अपनी आत्मकथा में मेरी आपबीती में इस तथ्य को स्वीकार कर चुकी हैं कि उनकी सेना के सेनाध्यक्ष स्तर के लोग कमीर में एक साथ एक लाख तक आतंकियों को भेजकर हमले की तैयारी में रहे हैं और अब जबकि खुले और साफ सबूत हमारे पास हैं फिर कार्यवाही में देरी का मतलब ही क्या है । अब तो हालात यह कि कसाव तथा उस जैसे अन्य आतंकवादियों की सुरक्षा, देखरेख तथा उसको जीवित रचाने की व्यवस्था में जितना धन, सुरक्षा ऎजेंसियों का जितना समय तथा जेलों में विशेष  सुरक्षा बैंरको तथा उनकी कोटर् में पेशी आदि पर जितना खर्च  हो रहा है संभवतः वह खर्च  देश  के किसी बड़े राज्य की सरकार के द्वारा कुल व्यय से भी अधिक होगा । अबू सलेम, बबलू श्रीवास्तव जैसे लोग जेल से ही चुनाव लड़ने का ऎलान करते हैं तो कई संगीन मामलों में आरोपित तथा निचली अदालतों से सजा पाए अपराधी बड़ी अदालतों में मुकदमें लड़ते हुए मंत्री  पद पर तक काबिज हैं । ऎसे में लोकतंत्र् का संदेश  ही क्या है ।  
               कसाब के पुतले के दहन से अब काम चलने वाला है नहीं क्योंकि  इतने वर्षों  से परंपरा के पालन के नाम पर हो रहे दिखावे के कारण कितने ही बड़े अपराधी आराम से घूम रहे हैं और वे कानून की धज्जियॉं उड़ाने के बाद देश  के लिए कानून बनाने वाली विधायिका के हिस्से बन रहे हैं फिर देश  की सवोर्च्च जन  पंचायत संसद  में भदेश   दृश्य  मंचित हो रहे हैं । हमारी कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के हिस्से से भी ऎसे मामलों में कोई तेजी नहीं आ रही है जिससे आम आदमी को लगे कि वह वास्वव में लोकतांत्र्कि गणराज्य का हिस्सा है । 
                हिंसा का जो नंगा रूप मुम्बई में २६/११ को हुआ उसके बाद में किस तरह के सबूत की आवयकता है, परन्तु हम देश  के कानून के लचीले स्वरूप में कब परिवतर्न लाऎंगे जिससे ऎसे मामलों में या इस जैसे मामलों में देश  की जनता को लगे कि न्याय हो रहा है । न्याय होना और न्याय होते दिखाई देना दोनों ही ऎसे मामलों में जरूरी है । अब पता चलता है कि राजीव गॉंधी की हत्या के मामले में सजा पाए, संसद काण्ड में सजा पाए आतंकियों को भी अभी सजा मिली नहीं है तो आम आदमी किस दिन तक इंतजार करे ऎसे में होलिका के साथ कसाव का पुतला जलाकर ही सही उसने अपने गुस्से का इजहार भी कर दिया तथा अपनी ओर से उसकी सजा भी बता दी, परन्तु वास्तव में कसाव या उस जैसे अन्य आतंकवादियों सजा मिलेगी भी कि नहीं और वह मिलेगी भी तो कब यह भविष्य  के गर्त  में बंद है । लेकिन एक बात साफ है कि अब आम आदमी राजनीतिक दलों की इस तरह की पैंतरेबाजी से उब चुका है कि वे आतंकवाद के विरोध में हैं परन्तु उसे सख्ती से कुचलने के प्रति कानून बनाने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है ।            राजनीतिक दल शोर  तो काफी करते हैं कि अपराधियों को राजनीति में प्रवेश  न हो परन्तु हर दल के अपने अपराधियों के लिए अलग मानदण्ड हैं और दूसरे दले के अपराधियों के लिए अलग मानदण्ड हैं। यही नहीं कल तक अपराधी विरोधी दल में था तो अपराधी था और अपने दल में आते ही वह महात्मा घोषित जाता है । संगीनों के साए में, अपराधियों के साथ सरेआम घूम  रहे तथा भ्रटाचार के आरोपों से घिरे लोग हमारे तंत्र् में लोकनायक होने तथा न्याय, अंिहंसा तथा ईमानदारी का पाठ पढ़ने का उपदेश दे रहे हैं लोकतंत्र् का इससे भद`दा मजाक और क्या हो सकता है । ऎसे में लोकतंत्र् में ताकतवर अपराधियों से धिरे जनसमूह को आतंकवादियों के या किसी अन्य अपराधी का पुतला जलाने मात्र् से क्या होगा । हिन्दी फिल्मों में भी ऎसा कई बार होता है जब हमारे अभिनेता अकेले होने के बावजूद कई कई खलनायकों को मार देते हैं हम सिनेमा घरों  तथा टेलिविजन पर यह देखते हैं और आनंदित होते हैं, परन्तु वास्तविक दुनिया में आते ही फिर हम वही देख रहे हैं जो देखना भी नहीं चाहते । 
                हमारे लोकतंत्र् की इस असलियत को हम शायद  अभी स्वीकार नहीं कर पा रहे है कि अब अपराधी तथा आतंकवादी वोट बैंक को प्रभावित करने तथा कराने वाले असरकारी तत्व है जो अब हमारे राजनीतिक दलों के लिए प्रभावकारी ताकत बनते जा रहे हैं ऎसे में यही सोचना है कि आखिर हमारे राजनीतिक आकाओं को कब यह पैगाम मिलेगा कि जनता कसाव का पुतला जलाकर यही सन्देश देना चाहती है कि वे अपराधियों तथा आतंकवादियों को वोट बैंक को प्रभावित करने वाली ताकत के रूप में देखना बंद करें ।
प्रो नवीन चन्द्र लोहनी

Wednesday, July 21, 2010

मीडिया की हिन्दी भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बने

हिन्दी वालों के बीच लगातार एक चर्चा चल रही है कि हिन्दी पाठ्यक्रमों में आधार पाठ्यक्रम का चयन किस प्रकार किया जाए? मैं पाठ्यक्रमों में चयन के लिए मीडिया में प्रसारित नए सीरियलों, वृत्त चित्रों, फिल्मों, विज्ञापनों सहित तमाम फीचरों को पाठ्यक्रम का एक आधार बनाने की पैरवी करता हूँ। मेरा सोचना है कि भविष्य में अगर हिन्दी के विकास के लिए कोई चीज जिम्मेदार होगी तो उसमें सर्वाधिक वे चयन होंगे जो वर्तमान हिन्दी के स्वरूप को उद्घाटित करने वाले होंगे जाहिर है कि इसमें सर्वाधिक, चर्चित विकासक्रम, संचारमाध्यमों द्वारा अपनाई गई हिन्दी का ही है जिसमें पारम्परिक हिन्दी बरक्स एक ऐसी हिन्दी खड़ी हो गई है जो आज अपने आप में अधिक प्रभावशाली, आक्रामक और सुलभ तरीके से लोगों के बीच पहुँच रही है। ऐसी हिन्दी से मेरा तात्पर्य है जो संस्कृतनिष्ठ बोझिलता से बाहर है और जिसमें उर्दू उच्चारण भंगिमा या अंग्रेजी की उच्चारण भंगिमा का अतिक्रमण होते हुए बंगला, मराठी, पंजाबी का हिन्दीकरण करते हुए एक अलग तरह की हिन्दी हमारे बीच आ रही है। मैं ऐसी हिन्दी का पक्षधर हूँ जो अपनी वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए किसी भी भाषा की शब्दावली को आत्मसात कर सके और उस परिवर्तन को हिन्दी की प्रवृत्ति के साथ तालमेल बिठाते हुए प्रयुक्त किया जाए कि वह भविष्य में हमें कभी भी बेगानी न लगे।

ऐसी हिन्दी खोजने के लिए आपको आज के संचार माध्यमों जाना पडेगा जहां पर हिन्दी के तरह-तरह के विकसित रूप प्रकट हो रहे है। ब्लॉग की दुनियां ने हिन्दी को एक नया आकार प्रकार दिया जो किंचित टेलीविजन माध्यमों और प्रिंट माध्यमों से आगे निकल रही है। अजीबोगरीब नामों से निकल रही कई पत्रिकाओं में व्यक्ति अपनी कुंठा से लेकर सदिच्छा तक लोगों तक निर्विरोध पहुँचा रहे हैं। जाहिर है उसका पक्ष-विपक्ष अभी तय होना बाकी है। लेकिन किसी भी भाषा के विकास के लिए उसके अपने विकास के तमाम रूपों को आगे आना जरूरी है। अर्थात् जब भी हम यह कहते हैं कि हमारी भाषा के विकास के नए रूपों को हम पहचानना चाहते है तो हमें किताबों की दुनियां से बाहर आकर एक ऐसी दुनियां भी अब आकर्षित कर रही है जो स्क्रीन पर है, जो जबान पर हैं और जिसका प्रयोग आमोखास बेखटके कर रहे हैं। इसलिए अगर हम यह देखना चाहते कि हिन्दी का एकदम नया चेहरा क्या है तो हमें माध्यमों के इन नए रूप से रूबरू होना एकदम जरूरी है।

मेरा सोचना है कि अगर भविष्य में हिन्दी पाठ्यक्रमों के विकास पर हम बात करें तो हम पाठ्यक्रमों में इस इन्टरनेट के ब्लॉग, टवीटर और फैस बुक पर आए हिन्दी रूप को ही नहीं एसएमएस की दुनियां में चल रही हिन्दी की एक आवाजाही को भी शामिल करें। जाहिर है ये सारे रूप आज की हिन्दी के रूप है। इसी प्रकार अगर टेलीविजन माध्यमों को देखें तो एक-एक चैनल पर आ रही हिन्दी आज उसके जीवन्त रूप को बनाए हुए है। वह हिन्दी जो किसी साहित्यिक कार्यक्रम में नहीं बोली गई जिसका वाचन कोई साहित्यकार या हिन्दी का भाषाविद् नहीं कर रहा है या जिस रचनाकार को पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं माना गया ऐसा सब कुछ हिन्दी के इस नए बाजार में, बाजारी शब्दावली में कहे हिन्दी की नई मंडी में मौजूद है। वह दूर लेह लद्दाख अरूणाचल कन्याकुमारी अण्डमान निकोबार जम्मू पंजाब में बैठा हुआ हिन्दी का प्रयोग कर्त्ता है जिसका मातृभाषा के रूप में हिन्दी से कोई सरोकार नहीं रहा और यह भी हो सकता है कि एक स्तर तक वह हिन्दी पाठ्यक्रम का विद्यार्थी न रहा हो किन्तु हिन्दी फिल्मों, गीतों, समाचार चैनलों से परिचित होते ये चेहरे अब हिन्दी के नए उपभोगकर्ता चेहरे है तो क्या हम भविष्य की हिन्दी में इनके द्वारा प्रयुक्त की जा रही हिन्दी की भारतीय छवि को शामिल नहीं करेंगे। आगे बात करें तो दूर मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गयाना, बर्मा, नार्वे सहित अन्य देशों में गए भारतीयों की बात करे जो कभी भारतीय मजदूर के रूप में वहां गए थे और आज भी हिन्दी प्रयोग किंचित बदलाव के साथ उनकी नई पीढ़ियाँ कर रही है या फिर वे टेक्नोक्रेट चिकित्सक और व्यवसायी जो विदेशों में रहकर हिन्दी के नए प्रयोगकर्ता बने है और जिनके बीच भारतीय भाषाओं की सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी अपना नया रूप ग्रहण कर रही है। मैं समझता हूँ हिन्दी के इन नए प्रयोगकर्ताओं पर और नई हिन्दी के प्रयोगकर्ताओं पर भी अब हिन्दी का भविष्य निर्भर है। इसलिए अगर हम सोचते है कि हिन्दी में नए बदलावों को आत्मसात करने और लागू करने की आवश्यकता है तो हिन्दी के इस नए प्रयोगकर्ता वर्ग को जानना, समझना, पहचानना पड़ेगा और उनकी हिन्दी को अपनी हिन्दी कहकर हिन्दी प्रयोग के इस नए परिप्रेक्ष्य को समझना भी पड़ेगा।

मेरा प्रस्ताव है कि हिन्दी पाठ्यक्रमों में टेलीविजन सीरियल, फिल्मों, वृत्त चित्रों, फीचरों, विविध समाचार विश्लेषण से जुड़े कार्यक्रमों तथा समाचार चैनलों में प्रसारित बुलेटिनों की हिन्दी को भी जोड़ना चाहिए। अगर हम हिन्दी में यह सब जोड़ते है तो हिन्दी बड़ी होती है और हिन्दी प्रयोगकर्ता के रूप में जो भी व्यक्ति हिन्दी अपनाने की कोशिश करता है वह हिन्दी का सिपहसलार बनकर उसके प्रयोग को बढ़ावा देता है। दूसरी तरफ नए माध्यमों में आ रही हिन्दी को भी उसी प्रकार अपनाने की आवश्यकता है। इन्टरनेट समाचार पत्रिकाओं से लेकर इन्टरनेट पर उपलब्ध हिन्दी की पत्रिकाओं और ब्लॉगों में हिन्दी का एक व्यापक संसार तैयार हो गया है इनमें वे पत्रिकाएं भी है जिन्होंने हिन्दी के परम्परागत साहित्य को आधार बनाकर अपना रूप निर्धारित किया है और वे भी अधुनातन शोध और ज्ञान की अधुनातन शाखाओं को अपने आधार सामग्री के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। जाहिर है ये सब हिन्दी के नए हितैषी है। कम्प्यूटर की दोस्ती के चलते करोड़ों पेज आज नेट पर उपलब्ध हैं तो क्या भविष्य में अगर हम हिन्दी पाठ्यक्रमों को निर्धारित करते है तो उनसे हिन्दी का लगाव बढ़ाने के लिए और उनके हिन्दी के प्रति प्रेम को बनाए रखने के लिए उनसे हिन्दी के नए पाठक वर्ग को जोड़ने का अपना कर्त्तव्य पूरा करना हमारी जिम्मेदारी नहीं है? अगर है तो हिन्दी के भविष्य के आधार पाठ्यक्रम चाहे वह स्कूल के स्तर के हो अथवा स्नातक और उच्चतर स्तर के लिए हिन्दी प्रयोग के इस नए क्षेत्र को भी हिन्दी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा।